Advertisement

📖 सभी कहानियाँ

दिव्य-दृष्टि -2 ( THE ACCIDENTAL AVATAR-2 )

 # **दिव्य-दृष्टि: THE ACCIDENTAL AVATAR**


---


## **एपिसोड 2: काला चश्मा, तीन इक्के और ख़ूनी साया**


---


### **भाग 1: 'आई-फ्लू' का बहाना और काला चश्मा**


लाजपत नगर के तीन मंजिला मकान के दूसरे माले पर, सुबह के दस बजे भी कबीर के कमरे में आधी रात जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था। कमरे की दोनों खिड़कियों पर गहरे नीले रंग के मोटे परदे खिंचे थे।


बिस्तर के कोने में दुबका बैठा था कबीर शर्मा। 


उसके चेहरे पर एक भारी, पोलराइज़्ड काला चश्मा चढ़ा हुआ था—वही एविएटर चश्मा जिसे वह लद्दाख की ट्रिप्स पर दोपहर की चिलचिलाती धूप से बचने के लिए पहनता था। लेकिन इस वक्त वह कमरे की ट्यूबलाइट बंद करके, अंधेरे में भी उस काले चश्मे को नाक पर टिकाए कांप रहा था।


"हे भगवान... बस एक बार नॉर्मल कर दो," कबीर ने दोनों हाथ जोड़कर हवा में हिलाए। "मैं कसम खाता हूँ, अगले तीन महीने तक कोई स्टंट वीडियो नहीं बनाऊंगा! हफ्ते में दो बार मंदिर जाऊंगा... शनिवार को शनिदेव पर तेल भी चढ़ाऊंगा! बस ये जादूगरी बंद करवा दो!"


उसने डरते-डरते काले चश्मे को अपनी नाक से आधा इंच नीचे खिसकाया।


*ज़ूम—*



उसकी पुतलियों में वही हलकी आसमानी चमक कौंधी। सामने रखी शीशम की भारी अलमारी की पॉलिश उड़ गई, लकड़ी भाप की तरह गायब हो गई और कबीर को अलमारी के लॉकर के अंदर रखी अपनी पुरानी 10वीं की मार्कशीट, मम्मी की सोने की चूड़ियों का लाल डिब्बा और उसके पीछे छिपाकर रखी गई उसकी आधी बीयर की बोतल साफ दिखने लगी!


"अरे यार! अलमारी के कपड़े तो छोड़ो, सीधे तिजोरी दिख रही है!" कबीर ने झटके से चश्मा वापस आँखों पर चढ़ा लिया और तकिए में मुंह छुपा लिया।


समस्या सिर्फ दीवारें या अलमारियां नहीं थीं। असली आफत तो सुबह नाश्ते की टेबल पर आई थी।


सुबह जब उसकी माँ, शांति देवी, उसके लिए आलू के परांठे लेकर आई थीं, तो कबीर ने गलती से उनकी तरफ देख लिया था। 


और उसे अपनी माँ के चेहरे की जगह उनकी खोपड़ी की हड्डियां, दांतों के मसूड़े और पेट के अंदर पचता हुआ आधा कप चाय और एक बिस्कुट साफ-साफ तैरता हुआ दिखाई दे गया था! कबीर ने वहीं चीख मार दी थी और थाली छोड़कर कमरे में भाग आया था।


माँ बेचारी घबरा गई थीं। उन्होंने तुरंत दरवाजा खटखटाकर पूछा था, *"कबीर! क्या हुआ बेटा? कोई भूत देख लिया क्या?"*


कबीर ने दरवाजे के उस पार से, चश्मे के पीछे से चिल्लाकर कहा था, *"मम्मी! कुछ नहीं हुआ... वो... मुझे बहुत खतरनाक वाला आई-फ्लू (Eye Flu) हो गया है! डॉक्टर ने कहा है कि रोशनी की तरफ देखा तो आँखें फूट जाएंगी! आप कृपया मेरे कमरे में मत आइए, इन्फेक्शन फैल जाएगा!"*


माँ ने बाहर से ही हल्दी वाला दूध दरवाजे के पास रख दिया और पड़ोस की वर्मा आंटी को फोन मिलाकर 'आँख आने का घरेलू नुस्खा' पूछने लगीं।


कबीर ने बिस्तर पर लेटकर अपनी हथेलियों को देखा। काले चश्मे के भीतर से दुनिया थोड़ी संभली हुई दिख रही थी। चश्मे का डार्क ग्लास उसकी इस नई, अलौकिक शक्ति के 'फोकस' को आधा कर देता था। जब तक वह किसी चीज़ को घूरकर न देखे, चश्मा दीवारों को ठोस बनाए रखता था।


"मतलब यह चश्मा मेरा सेफ्टी शील्ड है," कबीर ने राहत की एक ठंडी सांस ली। "अगर यह चश्मा उतर गया, तो दिल्ली की आधी आबादी मुझे कंकाल नज़र आएगी!"


---


### **भाग 2: विक्की की एंट्री और ताश का ड्रामा**


*ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन!*



कमरे का दरवाज़ा बिना किसी शिष्टाचार के धड़ाम से खुला। 


"अबे ओए शक्तिमान! क्या नाटक लगा रखा है तूने?" 


अंदर दाखिल हुआ विक्की मल्होत्रा। कबीर का बचपन का लंगोटिया यार, लाजपत नगर का लोकल 'जुगाड़ किंग', चौड़े कंधे, गले में सोने की नकली चेन और मुंह में इलायची चबाने की आदत। विक्की और कबीर ने नर्सरी से लेकर कॉलेज तक हर कांड साथ मिलकर किया था।


विक्की ने कमरे का अंधेरा देखा, फिर बिस्तर पर काला चश्मा लगाए बैठे कबीर को देखा, और ठहाका मारकर हंस पड़ा।


"अबे साले! कमरे में धूप निकल रही है क्या जो सलमान खान बनकर बैठा है?" विक्की ने सीधे कबीर के बिस्तर पर छलांग लगाई। "तेरी मम्मी बाहर रो रही हैं कि लड़के को काला मोतियाबिंद हो गया, और तू यहाँ स्वैग दिखा रहा है?"


"आवाज़ नीचे कर, कुत्ते!" कबीर ने उसका हाथ पकड़कर खींचा। "दरवाज़ा बंद कर पहले!"


"अरे क्या हुआ भाई? पहाड़ से गिरकर सचमुच भेजा हिल गया क्या तेरा?" विक्की ने संजीदा होकर पूछा, दरवाज़ा बंद करते हुए। "सुना बहुत गंदा एक्सीडेंट हुआ था। बाइक तो तेरी कबाड़ बन गई। तू सच में ठीक है ना?"


कबीर ने एक पल के लिए सोचा कि क्या विक्की को सच बता दे? लेकिन अगर वह कहता कि *'भाई, मैं दीवारों के पार देख सकता हूँ'*, तो विक्की उसे तुरंत शाहदरा के मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती करवा देता।


"विक्की... अगर मैं तुझसे कहूं कि मेरे साथ कुछ बहुत अजीब हो रहा है, तो तू यकीन करेगा?" कबीर ने धीमी आवाज़ में पूछा।


"कैसा अजीब? तू गे हो गया है?" विक्की ने आँखें मटकाईं।


"साले सीरियस हूँ मैं!" कबीर चिढ़ गया। उसने गहरी सांस ली। "मेरी आँखों में कुछ... गड़बड़ हो गई है। मैं चीजों के आर-पार देख सकता हूँ।"


कमरे में दो सेकंड का सन्नाटा छा गया। 


फिर विक्की ने कबीर का माथा छुआ। "बुखार तो नहीं है। अबे ओए, सस्ती चरस पी ली थी क्या पहाड़ों में? आर-पार देख सकता है? चल बता, मेरी जेब में क्या है?"


कबीर ने अपने काले चश्मे को हल्का सा नीचे किया। उसकी पुतलियों में वो हल्का आसमानी घेरा घूमा।


विक्की की जींस की दाहिनी जेब... 


कपड़े का रेशा गायब हुआ। कबीर को विक्की का लेदर का पर्स दिखा। पर्स के अंदर... 



"तेरी दाहिनी जेब में पर्स है," कबीर ने सपाट आवाज़ में कहना शुरू किया। "पर्स में कुल चार सौ बीस रुपये हैं—एक दो सौ का नोट, दो सौ-सौ के, और एक बीस का मुड़ा हुआ नोट। उसके पीछे आधार कार्ड है... और हां, पर्स के सबसे गुप्त वाले ज़िप में एक गुलाबी रंग का लिफाफा है, जिस पर लिखा है—'सॉरी सिमरन, अब कभी दारू नहीं पियूँगा'!"


विक्की का मुंह ऐसा खुला जैसे किसी ने जबड़ा नीचे खींच दिया हो। उसने झटके से अपना पर्स निकाला, नोट गिने, गुलाबी पर्ची देखी और फिर कबीर को ऐसे देखा जैसे सामने कोई एलियन बैठा हो।


"तू... तूने मेरी जेब कब काटी बे?!" विक्की हकलाया।


"मैंने तुझे हाथ भी नहीं लगाया, ढक्कन!" कबीर ने चश्मा वापस ऊपर चढ़ाते हुए कहा। "अब मान गया? मैं सच बोल रहा हूँ। मुझे सब दिख रहा है। सामने दीवार के उस पार शर्मा जी अभी-अभी बाथरूम से तौलिया लपेटकर बाहर निकले हैं!"


विक्की की आँखों में डर की जगह अचानक एक भयानक, लालची चमक कौंध गई। उसकी बांछें खिल गईं। उसने कबीर के दोनों कंधे पकड़ लिए।


"भाई! मेरे भाई! मेरे लंगोटिया यार!" विक्की लगभग चिल्ला पड़ा। "तू बीमार नहीं है, तू तो कुबेर का खजाना बन गया है बे!"


"क्या मतलब?"


"अबे गधे! आज रात हमारे मोहल्ले के क्लब में वो बिल्ला और उसके चमचे तीन-पत्ती (पोकर) की बाज़ी लगाने वाले हैं!" विक्की ने अपनी जांघ पर ताली मारी। "हर शनिवार को वो लोग पचास-पचास हज़ार का दांव खेलते हैं और बेईमानी करके जीतते हैं! अगर तू वहाँ बैठ गया... तो हमें उनके पत्ते पहले ही दिख जाएंगे! हम आधे घंटे में लखपति हो जाएंगे भाई!"


"दिमाग खराब है तेरा?!" कबीर ने उसे झिड़क दिया। "मैं यहाँ अपनी जान को रो रहा हूँ, और तुझे जुआ खेलना है? मुझे नहीं पता यह क्या बला है! मुझे पहले यह पता करना है कि मेरे साथ उस रात हुआ क्या था!"


---


### **भाग 3: पहाड़ों से आई खुशबू और तारा की आवाज़**


कबीर ने विक्की को बाहर भगाया और अपना फोन उठाया। 


उस रात का सच... उस सच की कड़ी सिर्फ एक ही जगह से जुड़ सकती थी—हिमाचल का वो छोटा सा गांव, *देवग्राम*।


कबीर ने अपनी डायरी से एक कागज़ का टुकड़ा निकाला, जिस पर देवग्राम की ग्राम-पंचायत और वैद्य रामप्रसाद के क्लिनिक का लैंडलाइन नंबर लिखा था। यह नंबर तारा ने कबीर के डिस्चार्ज होते वक्त उसके हाथ में थमाया था, यह कहकर कि *'अगर रास्ते में चक्कर आए, तो फोन कर लेना, दादाजी दवाई बता देंगे। खुद डॉक्टर मत बनना!'*


कबीर ने नंबर डायल किया। 


*ट्रिन... ट्रिन... ट्रिन...*


चार बज़ के बाद, दूसरी तरफ से फोन उठा लिया गया।


"हैलो? देवग्राम औषधालय। दादाजी अभी जंगल गए हैं, शाम को फोन करना!" वही तेज-तर्रार, खनकती हुई आवाज़। 


कबीर के चेहरे पर अनजाने में ही एक चौड़ी मुस्कान आ गई। उसकी सारी घबराहट जैसे एक पल के लिए हवा हो गई।


"और अगर मरीज़ को शाम तक का इंतज़ार न हो, तो क्या कंपाउंडर साहिबा से बात हो सकती है?" कबीर ने शरारती लहजे में कहा।


फोन के उस पार एक सेकंड की खामोशी छा गई। फिर तारा की चौंकती हुई आवाज़ आई:


"अरे! मिस्टर दिल्ली वाले स्टंटमैन? तुम ज़िंदा पहुँच गए दिल्ली? मुझे लगा था तुम्हारी आदतें देखकर कि तुम रास्ते में ही किसी बस के नीचे आ गए होगे!"


"तुम्हारी कड़वी ज़बान की दुआ साथ थी, तो यमराज ने रास्ते में ही यू-टर्न ले लिया," कबीर ने हंसते हुए कहा। "कैसी हो तारा?"


"मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ, अपने पहाड़ों की ताज़ा हवा में सांस ले रही हूँ, तुम्हारी दिल्ली के धुएं की तरह नहीं," तारा ने तंज कसा, लेकिन उसकी आवाज़ में एक छुपी हुई राहत साफ महसूस हो रही थी। "वैसे... फोन क्यों किया? सच में तबीयत खराब है क्या? सिर का दर्द कैसा है?"


कबीर थोड़ा गंभीर हो गया। उसने अपनी आवाज़ धीमी की।


"तारा... मुझे एक बहुत ज़रूरी बात पूछनी थी। जब तुमने मुझे उस सुबह नदी के किनारे से उठाया था... क्या मेरे कपड़ों पर कुछ अजीब था?"


"अजीब?" तारा ने सोचते हुए कहा। "अजीब मतलब? तुम्हारे कपड़े तो पूरी तरह फटे हुए थे, कीचड़ में सने थे... हाँ, एक बात अजीब थी।"


कबीर की सांसें अटक गईं। "क्या?"


"तुम्हारी जैकेट के कॉलर पर और तुम्हारी छाती पर कुछ काली, जली हुई पत्तियाँ चिपकी हुई थीं," तारा ने याद करते हुए बताया। "दादाजी ने जब वो पत्तियाँ देखीं, तो वो बहुत हैरान हुए थे। वो 'नील-कल्प' की पत्तियाँ थीं।"


"नील-कल्प? वो क्या होता है?"


"वो एक बहुत ही दुर्लभ, चमत्कारी जड़ी-बूटी है कबीर। वो पार्वती घाटी में कहीं नहीं उगती। पूरे हिमाचल में वो सिर्फ एक ही जगह पाई जाती है—'शैतान खड्ड' की खूनी गुफाओं में। दादाजी कह रहे थे कि वो पत्तियाँ किसी सामान्य आग में नहीं, बल्कि किसी तांत्रिक अनुष्ठान में जलाई गई थीं। उनकी राख में से कपूर और उल्का-भस्म की महक आ रही थी।"


कबीर के रोंगटे खड़े हो गए। उसके दिमाग में बिजली की तरह कौंधा—*शैतान खड्ड... तांत्रिक अनुष्ठान... उल्का-भस्म!*


"कबीर? तुम सुन रहे हो?" फोन के उस पार से तारा की आवाज़ आई, जिसमें अब चिंता घुल चुकी थी। "क्या हुआ? तुम इतने परेशान क्यों लग रहे हो? सब ठीक तो है ना वहाँ?"


कबीर ने अपने सूखे गले को तर किया। "तारा... वो... मैं बाद में बताऊंगा। बस एक बात बताओ, क्या वो शैतान खड्ड वही जगह है जहाँ मेरा एक्सीडेंट हुआ था?"


"हाँ, ऊपर वाले मोड़ के ठीक नीचे वही खाई है," तारा ने धीमे से कहा। "लोग कहते हैं वहाँ जाना मौत को दावत देना है। कबीर... तुम ठीक तो हो ना? सच बताओ मुझे।"


तारा की आवाज़ में जो अपनापन और घबराहट थी, उसने कबीर के दिल को छू लिया। 


"मैं बिल्कुल ठीक हूँ, तारा," कबीर ने हौले से कहा। "बस तुम्हारी आवाज़ सुननी थी... सिर का दर्द थोड़ा कम हो जाता है।"


"धत्त! बेशर्म!" तारा की हंसी की खनक फोन पर गूंज उठी। "फ्लर्ट करना बंद करो और आराम करो! अगर कुछ गड़बड़ लगे, तो तुरंत फोन करना, समझे?"


"यस, डॉक्टर साहिबा। बाय।"


फोन कट गया। 


कबीर ने फोन को सीने से लगा लिया। पहेली के टुकड़े अब आपस में जुड़ रहे थे। वह किसी सामान्य नदी में नहीं गिरा था। वह शैतान खड्ड में किसी तांत्रिक के महायज्ञ के ठीक बीचों-बीच गिरा था। और जो शक्ति उस तांत्रिक को मिलनी थी... वो गलती से कबीर के अंदर आ गई थी!


---


### **भाग 4: सेंट्रल मार्केट का एक्शन और पहली जंग**


शाम के करीब सात बजे, विक्की कबीर को जबरदस्ती खींचकर लाजपत नगर की सेंट्रल मार्केट ले आया था।


"अबे थोड़ा बाहर निकल, ताज़ी हवा खाएगा तो भूत-प्रेत का वहम दिमाग से निकलेगा!" विक्की उसे समोसे की दुकान की तरफ खींच रहा था।


कबीर ने चेहरे पर वही काला चश्मा लगा रखा था। मार्केट में भारी भीड़ थी—दुकानदार चिल्ला रहे थे, चाट के ठेलों पर औरतें मोलभाव कर रही थीं और गाड़ियों के हॉर्न कान के पर्दे फाड़ रहे थे।


तभी, अचानक बाज़ार के बीचों-बीच स्थित एक बड़े ज्वेलरी शोरूम—'महावीर ज्वेलर्स'—के बाहर एक ज़ोरदार चीख गूंजी:


"बचाओ! डाकू! गोली मार देंगे ये लोग!"


*ठाँय!*



हवा में एक गोली चलने की आवाज़ ने पूरे बाज़ार में भगदड़ मचा दी। लोग अपनी दुकानें छोड़कर, सामान फेंककर इधर-उधर भागने लगे।


तीन नकाबपोश बदमाश, हाथों में देसी कट्टे और ऑटोमैटिक पिस्तौल लिए, ज्वेलरी शोरूम के अंदर से सोने के बैग लेकर बाहर निकले थे। उनमें से एक लंबे, भारी शरीर वाले बदमाश ने एक छह साल की छोटी बच्ची को अपनी बांह में जकड़ रखा था और उसकी कनपटी पर बंदूक तान रखी थी!


"कोई आगे बढ़ा तो इस बच्ची की खोपड़ी उड़ा दूंगा!" वो चीखा।


बच्ची की माँ ज़मीन पर गिरकर छाती पीट रही थी, "मेरी बच्ची को छोड़ दो! भगवान के लिए छोड़ दो!"


भीड़ तमाशबीन बनी पचास कदम दूर खड़ी थी। किसी में आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं थी। विक्की ने कबीर का हाथ खींचा, "कबीर, भाग यहाँ से! इनके पास बंदूकें हैं!"


लेकिन कबीर के पैर ज़मीन में जम गए। 


उस बच्ची की रोती हुई आँखें... कबीर के अंदर का खून खौल उठा। एक 22 साल का लापरवाह लड़का अचानक कुछ ऐसा महसूस कर रहा था जो उसने पहले कभी नहीं किया था—ज़िम्मेदारी।


"तू यहीं रुक, विक्की," कबीर ने फुसफुसाया।


"पागल हो गया है क्या?! वो गोली मार देगा!"


कबीर ने अपनी उंगलियों से अपना काला चश्मा धीरे से अपनी जेब में रख लिया।


उसकी आँखें पूरी तरह खुल गईं।


उसकी पुतलियों के इर्द-गिर्द नीली लपटों का एक सूक्ष्म चक्र घूमा। पूरा माहौल उसके लिए जैसे धीमा (slow-motion) हो गया।


कबीर ने सामने देखा। 


उसकी दिव्य-दृष्टि ने एक सेकंड में तीनों बदमाशों का 'एक्स-रे' कर दिया!


*बदमाश नंबर 1 (जिसने बच्ची को पकड़ा था):* उसकी पिस्तौल की मैगज़ीन में सिर्फ दो गोलियां बची थीं। उसका ट्रिगर पर रखा हाथ पसीने से कांप रहा था। उसके दिल की धड़कन 140 प्रति मिनट की रफ्तार से धड़क रही थी—वो घबराया हुआ था!


*बदमाश नंबर 2 (बाएं वाला):* उसकी चमड़े की जैकेट के अंदर, कमर के पीछे एक अतिरिक्त छुरा खुंसा हुआ था।


*बदमाश नंबर 3 (दाएं वाला):* वो बैग लेकर पीछे खड़ी सफेद वैन की तरफ भागने की तैयारी कर रहा था। कबीर ने देखा कि उसकी पिस्तौल का सेफ्टी-कैच (Safety Catch) अभी भी लगा हुआ था—मतलब उसकी बंदूक से गोली चल ही नहीं सकती थी!


"विक्की! दाएँ वाले के पास जो बंदूक है, वो लॉक है! वो डमी है!" कबीर ने चिल्लाकर कहा।


"क्या?!"


इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, कबीर ने बिजली की फुर्ती से ज़मीन से आधा ईंट का टुकड़ा उठाया।


कबीर की आँखों ने टारगेट को लॉक किया—हवा की गति, दूरी, और उस तीसरे बदमाश का दाहिना घुटना। 


कबीर ने पूरी ताकत से ईंट फेंकी।


*सटाक!*


ईंट सीधे तीसरे बदमाश के घुटने के जोड़ (patella) पर जाकर लगी। 


"आहहह!" बदमाश चीखते हुए मुंह के बल ज़मीन पर गिरा, सोने का बैग हाथ से छूट गया।


दूसरे बदमाश ने तुरंत कबीर की तरफ पिस्तौल तानी। लेकिन कबीर को उसके हाथ की नसें और उंगलियों का खिंचाव गोली चलने से आधा सेकंड पहले ही दिख गया! जैसे ही उसने ट्रिगर दबाने की कोशिश की, कबीर ने बगल में खड़े एक गोलगप्पे के ठेले के लोहे के ड्रम के पीछे डाइव लगा दी।


*ठाँय!*


गोली ड्रम को छूकर निकल गई।


कबीर ड्रम के पीछे से बिजली की तरह निकला। उसने ज़मीन पर पड़ी एक लोहे की रॉड उठाई। 


अब बचा था मुख्य बदमाश, जिसने बच्ची को पकड़ रखा था। उसने घबराकर बच्ची की गर्दन पर पिस्तौल का दबाव बढ़ा दिया। "पीछे हट! वरना इसे मार दूंगा!"


कबीर पाँच कदम की दूरी पर रुक गया। 


उसकी नीली आँखें सीधे बदमाश की पिस्तौल के अंदर देख रही थीं। चैंबर के अंदर पीतल की गोली स्प्रिंग के दबाव में बैठी थी। हैमर पीछे खिंचा हुआ था। 


कबीर ने अपनी दृष्टि को थोड़ा और फोकस किया। 


उसे बदमाश के हाथ के नर्वस सिस्टम की हरकत दिखी—वह अगले ही सेकंड अपनी उंगली का दबाव ट्रिगर पर बढ़ाने वाला था।


"अब नहीं!" 


कबीर ने लोहे की रॉड को जमीन पर पटका। ध्यान भटकाने के उस मिली-सेकंड में, कबीर ने अपनी बायीं जेब से चाबियों का भारी गुच्छा निकाला और सीधे बदमाश की आँख की तरफ फेंक दिया!


बदमाश ने अनजाने में अपनी आँखें बचाईं और उसका हाथ बच्ची के सिर से एक इंच हटा।


उसी एक इंच के गैप में, कबीर चीते की तरह लपका!


उसने बदमाश की कलाई को दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर की तरफ मोड़ दिया। 


*ठाँय!*


गोली हवा में, आसमान की तरफ चल गई। 


कबीर ने अपने दाहिने घुटने से पूरी ताकत से बदमाश के पेट के उस हिस्से पर वार किया जहाँ उसका लिवर था—जो कबीर को उसकी त्वचा के पार साफ दिख रहा था! सबसे कमजोर बिंदु!


"उफफ्फ!" 


बदमाश की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। सांसें अटक गईं। उसने बच्ची को छोड़ दिया। बच्ची तुरंत दौड़कर अपनी माँ की बाहों में जा समाई।


कबीर ने बदमाश को कॉलर से पकड़ा और उसे उठाकर महावीर ज्वेलर्स के लोहे के शटर पर दे मारा!


*धड़ाम!*


बदमाश ज़मीन पर ढेर हो गया, अचेत।


पूरे बाज़ार में सन्नाटा छा गया। जो लोग भाग रहे थे, वो ठहर गए। 


विक्की अपनी जगह पर बुत बना खड़ा था, उसकी आँखें बाहर आ गई थीं। "यह... यह कबीर है या जॉन विक?!"


भीड़ ने अचानक तालियां बजानी शुरू कर दीं। "अरे वाह लड़के! क्या बात है! पुलिस को फोन करो!"


कबीर की छाती धौंकनी की तरह चल रही थी। उसकी आँखों की नीली रोशनी धीरे-धीरे शांत हुई। सिर में अचानक भयंकर दर्द का झटका लगा—अपनी शक्ति का इतना गहन इस्तेमाल करने की कीमत उसका शरीर मांग रहा था।


उसने जल्दी से जेब से अपना काला चश्मा निकाला और आँखों पर चढ़ा लिया।


"विक्की! निकल यहाँ से, इससे पहले कि पुलिस हमसे सवाल पूछे!" कबीर ने विक्की का हाथ खींचा और दोनों भीड़ का फायदा उठाकर पतली गलियों में गायब हो गए।


---


### **भाग 5: दिल्ली की सीमा पर 'काल-छाया'**


रात के बारह बजे। 


कश्मीरी गेट बस अड्डे के पास, यमुना नदी का गंदा, बदबूदार किनारा।


सर्द हवाओं और घने स्मॉग के बीच, एक लंबा, भयानक साया नदी के किनारे जलती हुई एक छोटी सी चिता के पास खड़ा था।


अघोरी तांत्रिक रुद्रकाल दिल्ली पहुँच चुका था।


उसने एक काला लंबा चोला पहन रखा था, लेकिन उसकी कमर में बंधा नरमुंडों का पट्टा और उसकी लाल, अंगारे जैसी आँखें रात के अंधेरे में भी चमक रही थीं। उसके एक हाथ में कबीर का वो आधा जला हुआ मोटो-ब्लॉगिंग हेलमेट था, जिसे वह हिमाचल की खाई से ढूंढ कर लाया था।


रुद्रकाल ने चिता की राख में से एक मुट्ठी काली मिट्टी उठाई। 


उसने हेलमेट के टूटे हुए शीशे पर लगे खून के सूखे हुए कतरे को अपनी लोहे की छुरी से खुरचा। वो खून कबीर का था, जो हादसे के वक्त हेलमेट पर लग गया था।


रुद्रकाल ने उस खून की पपड़ी को एक काले मिट्टी के सकोरे में रखा। उसमें चिता की भस्म, धतूरे का रस और तीन मरे हुए बिच्छू डाले।


उसने अपने दोनों हाथ आसमान की ओर उठाए। उसके मुंह से प्राचीन तिब्बती श्मशान-मंत्रों की फुसफुसाहट निकलने लगी:



*"ॐ रक्त-बीजाय, प्राण-आकर्षाय, त्रिनेत्र-चोराय नमः... जा! ढूंढ उसे!"*


*सsssss!*


सकोरे के अंदर से काले रंग का एक गाढ़ा, जहरीला धुआँ उठा। 


वह धुआँ हवा में तैरते हुए एक विशाल, डरावने कौवे (शिकारी पक्षी) की परछाई में बदल गया। उस परछाईं की आँखें ठीक वैसी ही लाल थीं जैसी रुद्रकाल की थीं।


रुद्रकाल ने अपनी छुरी से अपनी हथेली पर चीरा लगाया और बहता हुआ खून उस धुएं की परछाईं पर छिड़क दिया।


"जिसने भी मेरी तपस्या की चोरी की है... यह खून उसकी रगों को पहचानता है!" रुद्रकाल की आवाज़ किसी भेड़िए की तरह घुरघुराई। "जा मेरी काल-छाया! इस शहर के हर कोने को छान मार! उस चोर के सिर पर जाकर मंडरा!"


काली परछाईं ने हवा में एक भयानक चीख मारी और दिल्ली के धुंध भरे, नीले आसमान में ऊंची उड़ान भर ली।


रुद्रकाल ने अपने गंदे, नुकीले दांत निकाले। उसकी नजरें उस दिशा में टिक गईं जहाँ लाजपत नगर की बत्तियां जल रही थीं।


"मिल गया तू मुझे..." रुद्रकाल बुदबुदाया, उसकी हँसी में मौत की आहट थी। "बस कुछ ही सांसें बाकी हैं तेरी, ऐ अनजान चोर। तेरी आँखें निकाल कर जब मैं अपनी खोपड़ी में लगाऊँगा... तब पूरा ब्रह्मांड मेरे सामने घुटने टेकेगा!"



आसमान में काले कौवे की चीख बादलों को चीरती हुई कबीर के घर की तरफ बढ़ रही थी।


---


**(जारी रहेगा... अगले एपिसोड 3 में: "शिकारी की नज़र और कॉलेज का तमाशा")**

📖 संबंधित कहानियाँ (Related Stories)